तन्हा
अकेला ही चला था ,
बस यूँ ही बढ़ता गया था .
न तो रास्ते की खबर थी ,
न ही मंज़िल का पता था .
चारों तरफ था पसरा ,
ख़ामोशी और सन्नाटा .
अकेला ही चला था ,
बस यूँ ही बढ़ता गया था .
इस निर्जन , रसविहीन जीवन के ,
उददेश्य ही सारे धुल गए थे .
अपनों से मिली थी बेवफाई ,
अकेला मैं हो चला था .
राह काँटों का मुझको , चुनना ही पड़ा था ,
विदीर्ण हो कर भी मैं आगे को बढ़ चला था .
मंजिल मेरी थी हर पल , सिमटी ही जा रही थी ,
रास्ते भी तो सारे , अवरूद्ध नज़र आ रहे थे .
ज़िन्दगी मैं तेरे आगे , करता हूँ अब समर्पण ,
जिंदगी की डोर अपनी , कर रहा हूँ तुझको मैं अर्पण .
अकेला जो मैं चला था ,
अब अकेला ही जा रहा हूँ ...