Sunday, February 16, 2014

ज़िन्दगी का सफ़र

छोटी सी है ज़िन्दगी, तन्हा सा ये सफ़र है । 
मुसाफ़िर है हम वक़्त के, फ़िर है सो जाना ॥ 

बंद है जो ये दीवारे, क्युँ तू सर  पटक रहा है । 
लम्हा तुझे एक मिला है, बाग़ आज आगे खिला है ॥ 

कुछ  पल का है तमाशा, फाटक आगे खुला है । 
 मंच सामने  सजा  है, लोग बैठे हैं टुकटुकी लगाए ॥ 

तमाशा कि है ख्वाहिश, आस तुझ पे लगाए ।  
तेरे ऊपर है सबकी नज़रे,  तमाशा तू इन्हें दिखा जा ॥ 

किस गम में तू खफा है, या खोया है तू किस ख़ुशी में । 
दो पल की है ये कहानी, जी ले तू इसमें ज़रा सा ॥ 

खोल मुस्कान का फाटक, आज सजा ले महफ़िल । 
कल अभी दूर पड़ा है, बंद अस्थिर कल्पित धरा है ॥ 

सपने हैं तेरे कई सारे, अरमान सब दबे पड़े है । 
मत रख उन्हें सिराहने, कल्पित कल अभी दूर धरा है ॥ 

रोड़े हैं कई सारे , मुश्किलें भी कड़ी है । 
पर तू है एक मुसाफ़िर , आगे तू बढ़े जा ॥

हौसला धरे तू ,सामने  तू बढे जा  ।
बाँध हिम्मत कि चोली ,ओढ़ विश्वास कि चादर ।

 कुछ पल के लिए तू ,ख़ुद के लिए जिए जा । 
साथी मिलेंगे कई सारे , मंजिल तेरी सजेगी ॥ 

सेतु, दरिया जायेंगे सिमटते , तेरे करवटे बदलते  । 
अगर फिर भी न तू  चढ़ पाया , सो जाना हँसते हँसते ॥ 

छोटी सी थी ज़िन्दगी, मुसाफ़िर था तू कल का  । 
लम्हा जो मिला था, जी लिया तुमने लड़ते लड़ते ॥ 






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